रुचि के स्थान

थावे मंदिर :

जिला मुख्यालय से 6 कि0 मी0 की दूरी पर दक्षिण दिशा में एक गांव है जहां उत्तर पूर्वी रेलवे का मशरख – थावे अनुभाग और सिवान-गोरखपुर लाइन का एक जंक्शन स्टेशन “थावे” अवस्थित है। गांव में एक
पुराना किला है लेकिन किले का इतिहास अस्पष्ट है। हथुआ के राजा का एक महल था, लेकिन अब यह अवनति की अवस्था में है। हथुआ राजा के निवास के करीब एक पुराना देवी दुर्गा का मंदिर अवस्थित है।
मंदिर के बाड़े के भीतर एक अजीब वृक्ष है, जिसके वनस्पति परिवार का अभी तक पहचान नहीं किया गया है। पेड़ क्रॉस की तरह बढ़ा हुआ है। मूर्ति और पेड़ के संबंध में विभिन्न किंवंदन्तियाँ प्रचलित हैं। चैत्र
माह (मार्च-अप्रैल) में सालाना एक बड़ा मेला आयोजित किया जाता है।

श्री पीताम्बरा पीठ (माँ बंगलामुखी) :

श्री पीताम्बरा पीठ, प्रसिद्ध शक्ति पीठों में से एक है और यह जिला मुख्यालय से 15 कि0 मी0 दूरी पर कुचायकोट में अवस्थित है। हिन्दू धर्म अनुसार बंगलामुखी दस महाविद्याओं (महान ज्ञान) में से एक हैं। बंगलामुखी देवी भक्त की गलतफहमी और भ्रम को अपनी गदा से दूर कर देती हैं। इस नाम का शाब्दिक अर्थ वग्ला स्वरुप होता है। बंगला संस्कृत के ‘वग्ला’ शब्द का विरूपण है। माँ बंगलामुखी का स्वरुप सुनहरे रंग का एवं कपड़े का रंग पीला होता है। माँ बंगलामुखी पीला कमल से भरा अमृत के महासागर के बीच में एक सुनहरा सिंहासन पर विराजमान होती हैं। एक अर्ध चंद्र उनके माथे को सुशोभित करता है।
देवी को विभिन्न ग्रंथों में दो अलग-अलग तरीकों से वर्णित किया गया है- `द्वि-भुज'(दो हाथ) और ‘चतुर्भुज'(चार हाथ)। माता का द्वि-भुज स्वरुप अधिक प्रचलित है और इसे ‘सौम्य’ स्वरुप के तौर पर वर्णित किया गया है। माता अपने बाएं हाथ से राक्षस के जिह्वा को खींचती है एवं दाहिने हाथ से राक्षस पर गदा से वार करती हैं। माता का यह शक्ति स्वरुप दुश्मन को स्तब्ध करने वाला है एवं वास्तव में एक वरदान है जिसके लिए भक्त उनकी पूजा करते हैं।

दिघवा – दुबौली:

गोपालगंज अनुमंडल के पूर्वी छोर पर जिला मुख्यालय से दक्षिण – पूर्व दिशा में 40 कि0 मी0 की दूरी पर एवं छपरा से उत्तर दिशा में 56 कि0 मी0 की दूरी पर यह गांव अवस्थित है। यह उत्तर-पूर्वी रेलवे के छपरा-मशरक खंड का एक रेलवे स्टेशन भी है। यह एक प्राचीन स्थल है और यहां दो असाधारण पिरामिड-आकार के ढांचे पाए जाते हैं। ये दो ढांचे गांव के दक्षिण-पूर्व के करीब स्थित हैं, और एक दूसरे के पूर्व और पश्चिम में स्थित हैं। पश्चिमी ढांचा लगभग गांव के दक्षिण पूर्वी छोर के आसपास स्थित है और पूर्वी ढांचा दूसरे ढांचे के दक्षिण-पूर्व में 640 फीट की दूरी पर स्थित है और सड़क के नजदीक है। इनमें से प्रत्येक ढांचा पिरामिड आकार का है एवं इनका आधार चारो कोनों में फैला है। देखने में ऐसा प्रतीत होता है कि एक शंकु को केंद्र में रखा गया है। ये ढांचे मिट्टी के बने लगते हैं, लेकिन ईंट और मिट्टी के बर्तनों के छोटे टुकड़ों का मिश्रण भी इनमें पाया जाता है। पूर्वी ढांचा के दक्षिण में 950 फीट की दूरी पर माध्यम ऊँचाई का एक गोलाकार ढांचा जिसका क्षैतिज व्यास लगभग 200 फीट है। यहाँ एक पुराना कुआँ है। गांव के उत्तर में सड़क के पार ढांचा का एक हिस्सा है जो इस ढांचे के बड़े समतल भाग से सड़क द्वारा कटा हुआ दिखाई देता है एवं इसी पर दिघा दुबौली ग्राम अवस्थित है। ये ढांचे चेरो-चाई के काम हैं। चेरो एक आदिवासी जाति है जो एक बार देश के इस हिस्से में शक्तिशाली होते थे, लेकिन अब गंगा के दक्षिण में पहाड़ियों में निवास करते हैं।

हुस्सेपुर :

जिला मुख्यालय से 24 किलोमीटर की दूरी पर उत्तर-पश्चिम में झरनी नदी के पश्चिमी किनारे पर यह गांव स्थित है। ऐतिहासिक रूप से इस गांव के कुछ रोचक पहलू हैं। यह पूर्व में हथुआ महाराजाओं का कार्य क्षेत्र हुआ करता था। उनके द्वारा बनवाया गया ईंट का किला आज भी खंडहर अवस्था में है एवं वहां की खाई भर चुकी है। किला के पूर्वी भाग में चौदह छोटे टीले हैं जो बताते हैं कि यहाँ राजा बसंत शाही की पत्नी अपने 13 दसियों के साथ अपने मृतक पति का सर गोद में रखकर अपनी आहुति दे दी थी। फतेह शाही जो कि बसंत शाही के चचेरे भाई एवं डाकू थे ने बसंत शाही की हत्या आंदोलन के बारे में जानकारी पाने एवं ईस्ट इंडिया कंपनी को मदद पंहुचाने हेतु किया था।  हथुआ राज परिवार के सदस्य आज भी उन टीलों की पूजा करते हैं। ये टीले दिखने में 18वीं सदी के बाद के वर्षों के प्रतीत होते हैं यद्यपि किला इससे पहले हीं खंडहर में तब्दील हुआ प्रतीत होता है।

लकड़ी दरगाह :

यह गांव सिवान से उत्तर दिशा में 24 कि0 मी0 की दुरी पर अवस्थित है एवं जाहिर तौर पर अपने नाम के अनुसार यह एक मुस्लिम का मकबरा है ।यह मकबरा एक मुसलमान संत का है जिनका नाम शाह अरज़न था एवं वो पटना के थे। यह कहा जाता है कि वो इस एकांत स्थल से आकर्षित हुए थे एवं 40 दिनों तक उन्होंने यहाँ धार्मिक चिंतन किया था।उन्होंने एक धार्मिक प्रतिष्ठान भी स्थापित किया, जिसे सम्राट औरंगज़ेब ने संपन्न किया था।संत के मौत की सालगिरह हर साल रबी-उस -सनी के 11 वें दिन मनाई जाती है एवं इस दिन यहाँ काफी बड़ी भीड़ जमा होती है।